मानसिक तनाव (मनोविकार)

"मैं बहुत डिप्रेशन (अवसाद) में हू".. या "मैं बहुत डिप्रेस महसूस कर रहा हूँ".. ये जुमला हम भारतीय बहुतायत में इस्तेमाल करते हैं.. और हम ये कभी जान ही नहीं पाते कि उस वक़्त जिस वक़्त हम ये कहते हैं, हम न तो डिप्रेशन में होते हैं और न डिप्रेस होते हैं.. हमने अंग्रेज़ी का शब्द "डिप्रेशन" तो याद कर लिया मगर ये नहीं जान पाए कि इस शब्द की गहराई क्या है और इन टर्म को हमें इस्तेमाल कब करना है.. और ऐसे बोल बोल कर हमने इस शब्द को इतना आम बना दिया कि इसी वजह से इसकी गंभीरता ख़त्म हो गयी और ये एक "मनोविकार" से "आम भावनाएं" व्यक्त करने वाला शब्द बनकर रह गया.. इसीलिए जब हम सुनते हैं कि किसी ने "डिप्रेशन" में फांसी लगा ली तो हमें लगता है कि उस इंसान ने ऐसा क्यूं किया? क्योंकि मुझे भी रोज़ डिप्रेशन होता है.. बॉस गुस्सा करता है, पत्नी से लड़ाई होती है, बैंक में पैसा कम होता है तो मुझे डिप्रेशन हो जाता है मगर मैं कभी फांसी नहीं लगता हूँ? 

समझिये इसे कि आप जहां जहां डिप्रेशन शब्द इस्तेमाल करते हैं, वहां उस शब्द को इस्तेमाल ही नहीं करना होता है.. आप लोनली (अकेलापन), सैड (दुखी), वरीड (परेशान), anxious (चिंतिंत), फ्रस्ट्रेटेड (निराश), वीकनेस (कमज़ोरी), लेज़ीनेस (सुस्ती), फियर (डर) अगर महसूस करते हैं तो आप कह देते हैं कि मैं बहुत "डिप्रेशन" महसूस कर रहा हूँ.. ये पूरी तरह से ग़लत होता है.. ज़्यादातर लोग दुखी होने को डिप्रेशन समझते हैं और उन्हें सारी उम्र पता ही नहीं चल पाता है कि दरअसल उन्होंने कभी "डिप्रेशन" का सामना किया ही नहीं है

लोग कह रहे हैं कि इस लॉकडाउन में मज़दूर डिप्रेशन का शिकार हो रहा है.. जिनकी कमाई रुक गयी उन्हें डिप्रेशन हो रहा है.. किसान की फ़सल बर्बाद हो गयी इसलिए वो डिप्रेशन में फांसी लगा रहा है.. मगर ऐसा नहीं है.. ज़्यादातर मज़दूर अभी चिंतित है, दुखी है.. अपने भविष्य को लेकर निराश है.. उनको आप खाना दे देंगे और नौकरी दे देंगे वो ख़ुश हो जाएगा और उसका दुःख, चिंता और भय चला जायेगा.. जिनकी कमाई रुकी है उनको पैसा दे दीजिए वो सुखी हो जाएंगे.. जो किसान बैंक के डर, और चिंता से फांसी लगा रहा है, आप उसका लोन माफ़ कर देंगे तो वो फांसी नहीं लगाएगा.. ये लोग डिप्रेस नहीं है और न इन्हें डिप्रेशन है

हां, कई मज़दूर डिप्रेशन में जा सकते है अगर लॉकडाउन की ये स्थिति सालों बनी रह जाती है.. कई कारोबारी डिप्रेशन में चले जायेंगे अगर ये स्थिति लगातार दो चार साल चलती रही तो.. और जब ये लोग डिप्रेशन में चले जायेंगे तो आप उस वक़्त इनको पैसा दे दें, खाना दे दें, इनका लोन अदा कर दें.. ये लोग उस अवसाद से बाहर नहीं निकल पाएंगे.. डिप्रेशन या अवसाद को आपके शरीर मे जड़ बनाने के लिए वक़्त चाहिए होता है.. ये ऐसे हर दो मिनट में होकर खत्म नहीं हो जाता है.. और फिर जब ये हो जाता है तो बिना इलाज इसका जाना लगभग नामुमकिन होता है

इसलिए "डिप्रेशन" को आम बोलचाल का शब्द बनाने से बचिए.. ये एक भयानक और जटिल मनोविकार है.. आप जब इसे आम बोलचाल का शब्द नहीं बनाएंगे तब अगर किसी को पता चलेगा कि फ़लाने का एक साल से डिप्रेशन का इलाज चल रहा था और उसने आज फांसी लगा ली, तो लोग इसे एक मनोविकार के तौर पर लेंगे.. वरना अभी तो लोग ऐसे ही समझ रहे हैं कि जैसे उनको दिन में चार बार "डिप्रेशन" होता है और वो ईनो पी कर या अलो वेरा जूस पीकर ठीक हो जाते हैं, वैसे ही ये मरीज़ भी होते होंगे.. और उन्हें ये समझ ही नहीं आ रहा कि ऐसे छोटे से "मानसिक दुख", जिसका इलाज अलो वेरा और ईनो से वो कर लेते हैं उसके लिए कोई फांसी कैसे लगा सकता है?

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