मोनियर विलियम्स ने संस्कृत को क्यों चुना और वे इसे क्यों बढ़ाना चाहते थे

 संस्कृत के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हो, उसकी सामयिकता को नकारा जा रहा हो, ऐसे में 200 साल पहले जन्मे इंग्लिशमैन मोनियर विलियम्स की आधुनिक भोग—विलासी संस्कृति के लिए भी अनिवार्यता है कि उन्होंने देशु और दुनिया की सबसे पुरानी भाषा संस्कृत को क्यों चुना था और वे उसे क्यों बढ़ाना चाहते थे!

मोनियर विलियम्स ने भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संबंध पर अपना पूरा जीवन लगा दिया. अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि कोई भी भारतीय भाषा संस्कृत के बिना जीवित नहीं रह सकती. 5 नवंबर, 1851 को उन्होंने ‘इंग्लिश और संस्कृत शब्दकोष’ की भूमिका में लिखा,’ऐसी एक भी भारतीय भाषा नहीं है जो संस्कृत से शब्द उधार लिए बिना धर्म और विज्ञान के विचारों को व्यक्त करने में समर्थ हो। चाहे वह तमिल हो, तेलगु हो, बंगाली हो या कोई दूसरी.’

समूचा साहित्य संसार अतुलनीय प्रतिभा से संपन्न विद्वान मोनियर विलियम्स की दूसरी जन्म शताब्दी मना रहा है. उन जैसा बहुमुखी साहित्य रचने वाला और संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाला बहुश्रुत व्यक्ति अब शायद ही हो. पर 12 नवंबर, 1819 को मुंबई में जन्मे मोनियर विलियम्स जिस महत्वपूर्ण कार्य के लिए जाने जाते हैं, वह है उनके द्वारा बनाया ‘अंग्रेजी और संस्कृत शब्दकोश’.

संस्कृत साहित्य के मौजूदा शब्दकोषों में मोनियर विलियम्स का संपादित संस्कृत शब्द—संग्रह अद्भुत है। पर उन्होंने इस शब्कोष के अलावा कालिदास के दो ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया. मोनियर विलियम्स ने महाकवि कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीयम्’ का 1849 में और ‘अभिज्ञान—शाकुन्तलम्’ का 1853 में अंग्रेजी अनुवाद किया. शोध, अनुवाद और रचनात्मक साहित्य की दृष्टि से वे आधुनिक संस्कृत में अनुपम हैं. विश्व—स्तर पर पुरातन साहित्य और वैदिक संस्कृति की जब कभी बात होती है तो नि:संदेह मोनियर विलियम्स की लिखी पुस्तकें उपहार के तौर पर स्वीकारी जाती हैं. मोनियर ने हिन्दी व्याकरण पर भी काम करते हुए तीन पुस्तकें हिंदी भाषा के व्याकरण पर भी लिखीं.

मोनियर विलियम्स ने न केवल संस्कृत सीखी बल्कि संस्कृत को पूरे जीवन साथ रखा. संस्कृत की साधना की. इसी साधना के परिणाम में उनके वे ग्रंथ आए, जो आज भी उनकी अमर कीर्ति के रूप में हमारे बीच हैं. उन्होंने अनेक संस्कृत ग्रंथों और शब्दों को अनुवाद में ढाला. सुखद आश्चर्य की बात है कि संस्कृत को आधुनिक जगत से जोड़ने के लिए मोनियर ने डेढ़ शताब्दी पहले अंग्रेजी और संस्कृत के विशाल शब्दकोश का संपादन किया. हालांकि इससे पहले दो जर्मन विद्वान, रॉथ और बॉथलिंग संस्कृत और जर्मन भाषा के शब्दों का संकलन पांच खंडों में कर चुके थे. रूस के शासकों के आर्थिक अवदान से मुद्रित होने के नाते वह शब्दकोश आज भी ‘सेंट पीटर्सबर्ग डिक्शनरी’ कहा जाता है. इसे मोनियर विलियम्स ने देखा, जिसे पढ़कर उन्होंने सोचा कि इस विस्तृत शब्दकोश के स्थान पर एक नया संपूर्ण शब्दकोश होना चाहिए. जिसमें संस्कृत का संबंध जर्मन के बजाय अंग्रेजी से हो. वे पूरे मन से इस काम में जुट गए. लंबी मेहनत के बाद उनका शब्दकोश सामने आया. इसका पहले-पहल प्रकाशन ईस्ट इंडिया कंपनी ने 5 नवंबर, 1851 को किया. इस कोश में तकरीबन एक लाख अस्सी हजार शब्द हैं. इसकी खासियत है कि इसमें संस्कृत साहित्य के दोनों प्रकार, वैदिक और लौकिक के शब्द संकलित हैं, जो अन्यत्र प्राय: दुर्लभ हैं. अमरसिंह द्वारा लिखे ‘अमरकोश’ जैसे पुराने शब्दकोशों में वैदिक शब्दों का समावेश नहीं है. उनमें लगभग लौकिक संस्कृत के शब्द हैं. पिछली शताब्दी के वामन शिवराम आप्टे ने भी प्राय: वैदिक शब्दों को अपने शब्द—संग्रह में शामिल नहीं किया. इस नाते कहा जा सकता है कि संस्कृत का पहला और अंतिम शब्दकोश मोनियर विलियम्स ने ही तैयार किया. इतना ही नहीं, मोनियर ने संस्कृत के शब्दों के साथ उनके संदर्भ भी जोड़े. बाद में 1899 में उनके निधन के आसपास उनके ‘संस्कृत—अंग्रेजी शब्दकोश’ का प्रकाशन भी उनके नाम से ही हुआ, जो अनूठा है.

मोनियर के संस्कृत प्रेम की कहानी रोचक है. माना जाता है कि मुंबई में बचपन के दिनों में उनका संपर्क संस्कृत के एक शिक्षक से हुआ. वेद और उपनिषद की बातें तभी से मोनियर को सुहाने लगी, लेकिन वे उनसे विधिवत संस्कृत नहीं सीख सके. इसी दौरान मोनियर 10 साल की उम्र में मुंबई से इंग्लैंड चले गए, जहां उन्होंने संस्कृत समेत दूसरी एशियाई भाषाओं की पढ़ाई की. पढ़ाई पूरी करने के बाद 1844 में वे ईस्ट इंडिया कंपनी कॉलेज, कोलकाता में एशियाई भाषा विभाग में शिक्षक बन गए. यहां उन्होंने करीब 14 साल एशियाई भाषाओं संस्कृत, फारसी और हिंदुस्तानी का अध्ययन और अध्यापन किया. हिंदुस्तान में हुए 1857 के विद्रोह के बाद भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी शासन समाप्त होने पर वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में स्थापित संस्कृत अध्ययन पीठ पर बोडेन प्रोफेसर बने.

मोनियर विलियम्स के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में बोडेन प्रोफेसर बनने का किस्सा भी बहुत मजेदार है. लेफ्टिनेंट कर्नल जोसेफ बोडेन ने 1832 में भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी से सेवानिवृत्त होने के बाद अपना सारा धन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को दे दिया. इससे एक संस्कृत अध्ययन पीठ की स्थापना हुई. शुरूआती दो प्रोफेसर मतदान होकर चुनाव से नियुक्त हुए. पहले होरेस हेमैन विल्सन और दूसरे थे मोनियर विलियम्स.

होरेस हेमैन विल्सन के निधन के बाद मोनियर विलियम्स ने बॉडेन प्रोफेसरशिप चुनाव के लिए अपना आवेदन प्रस्तुत किया. उनका सामना उस दौर के विख्यात भाषाविज्ञानी मैक्समूलर से था, जिन्होंने ऋग्वेद पर गहरा अनुसंधान करके अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की थी. विश्वव्यापी प्रतिष्ठा के दोनों विद्वानों ने यह प्रोफेसरशिप पाने के लिए भरपूर चुनावी प्रयास किया. दोनों के अपने-अपने चुनावी दावे थे. जर्मन में जन्मे मैक्समूलर अपने काम को ऐतिहासिक बता रहे थे, वहीं मोनियर ने अपने शब्दकोश सहित दूसरे अकादमिक कार्यों को भारत को जानने का साधन बताया.

यह अप्रिय सत्य जरूर है कि मोनियर ने अपनी चुनावी प्रचार में यह दावा भी किया था कि भारत में ईसाई धर्म को बढ़ाने के लिए संस्कृत पढ़ना और समझना बेहद जरूरी है. उनके कार्य से मिशनरियों को फायदा होगा और वे उनके अनुवाद की सहायता से भारतीयों का धर्मांतरण आसानी से कर सकेंगे. 30 नवंबर, 1860 को मोनियर ने अपने पक्ष में चुनावी पत्र बंटवाया. इस पत्र में लिखा था, ‘यह प्रोफेसरशिप केवल ऑक्सफोर्ड के लिए नहीं है. यह भारत के लिए है. यह ईसाई धर्म के कल्याण के लिए है.’

7 दिसंबर, 1860 को हुए चुनाव में 3700 मतदाता थे, जिसमें प्रोफेसर्स और स्नातन विद्याार्थी शामिल थे. कुल 1443 वोट पड़े.  223 वोटों से मैक्समूलर को हराकर मोनियर ने चुनाव जीता और बोडेन प्रोफेसर पद पा लिया. नियुक्ति के बाद विलियम्स ने अपने उद्बोधन में कहा, ‘भारत में ईसाई धर्म का प्रचार यहां के विद्वानों के उद्देश्यों में से एक होना चाहिए.’ 1883 में मोनियर विलियम्स ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय धर्म अध्ययन केंद्र की स्थापना की. इस परियोजना के वित्तपोषण के लिए उन्होंने 1875, 1876 और 1883 में भारत की यात्राएं की. 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद यह केंद्र बंद हो गया.

मोनियर विलियम्स ने अपने लंबे जीवन में बहुत कुछ लिखा. सर्वत्र और सभी कुछ से सहमत होना असंभव है. उनके लेखन का विपुल अंश आवेग और धर्म—प्रचार से आविष्ट रहा है. ऐसी बातें तात्कालिक उपयोगी हो सकती हैं. पर बदलते संदर्भों के परिवर्तित घटनाक्रमों में अब उनकी कही सारी बातें सार्थक नहीं रह गई हैं. पक्षधर एवं प्रतिबद्ध लेखन में ये सामयिक दोष आ ही जाते हैं. परंतु इसके बावजूद जो बहुत कुछ बच जाता है जो अत्यंत महार्घ, अमूल्य और अतुलनीय है.

लंबे शोध के बाद मोनियर विलियम्स ने एक निष्कर्ष निकाला. उन्होंने लिखा, ‘हिंदू धर्म की अच्छाइयों का वर्णन कभी पूरा नहीं हो सकता, यह बहुरंगी धर्म हर धार्मिक और दार्शनिक विचार का स्पर्श करता है, जिसे दुनिया जानती ही नहीं है. मोनियर विलियम्स सनातन भारतीय धारा के अभिनव ऋषि हैं, संस्कृत साहित्य के भगीरथ हैं. कदाचित वे ही हैं, जो प्राय: गहरी निद्रा में सोए संस्कृत के मौजूदा वातावरण में आधुनिक चेतना की अलख जगा सकते हैं.

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